August 15, 2007

झंडा उठाते हैं हम



झंडा उठाते हैं हम
क्यों की
१५ अगस्त २६ जनवरी
के दिन कोई ये ना भूल जाये
कि इन्हे क्यों बना ते हैं हम
झंडा उठाते हैं हम

इन दिनों
कुछ अच्छा खापाते हैं हम,
लोगों को याद दिलाते हैं हम
झंडा उठाते हैं हम

जब कोई काफिला गुज़रता हैं
देश के ठेकेदारों का
इस सड़क से
तो खुद उठ जाते हैं हम
झंडा उठाते हैं हम.

आज़ादी सस्ती नही हैं,
बिकती नही हैं,
पर रोज़ बेच खाते हैं हम
5 रुपये में 2
झंडा उठाते हैं हम

May 19, 2007

जंग-ऐ-आज़ादी

1857 की क्रांती को आज 150 साल हो गए, आजादी मिली और ....
आज इंडिया गेट भी स्तब्ध है इस आजादी से।
कुछ पल जो मैंने बिताये उस दिन,
मुझे कुछ कहता हुआ सा लगा इंडिया गेट,
उसकी भावनाओ को लिखने कि कोशिश की है;
जो कुछ मै समझ सका,
आपके सामने है।
C
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जंग-ऐ-आज़ादी कि मशाल जली और बुझ गयी ।
हम आज़ाद हो गए बाहरवालों से ।

आज 150 साल हो चुके है उस सूरज को जो
उगा था 1857 में ।

और आज एक सूरज अस्त हो रहा है;
अपनी आज़ादी का ।

हम गुलाम हो गए है अपनो के ।
आज हमारी आवाज़ हमी तक नहीं पहुंचती,
आज
हमारे ही लोग हमारा शोषण करते है,
आज हम एक और अंधकार में घिर गए है,
वो जो दिन के रौशन उजाले में दिखाता है ।

बस एक चीज जो नहीं दिखती ,वो है
आज़ादी....

हर शाम कुछ कहती है ...

Click on the image for a larger view हर शाम में दफ्न हो जाता है
एक दिन जो जी लिया।
हर शाम कहती है;
कि आगे एक दिन और है।

जरा थम जा;
कुछ आराम करले,
एक लंबी रात बाक़ी है।
देख ले एक सपना,
क्या पता
कल कि सुबह
सच हो जाये...